Wednesday, April 15, 2026
HomeRaigarh Newsशांभवी इस्पात के खिलाफ फूटा गुस्सा, जन सुनवाई के विरोध में एकजुट...

शांभवी इस्पात के खिलाफ फूटा गुस्सा, जन सुनवाई के विरोध में एकजुट हुए ग्रामीण

औद्योगिक क्षेत्र गेरवानी-लाखा में फिर एक और कंपनी के खिलाफ लोगों में गुस्से की चिंगारी सुलगने लगी है। इस मर्तबे यह जनाक्रोश दरअसल शांभवी इस्पात प्रायवेट लिमिटेड को लेकर है। चूंकि, चंद रोज बाद ही यानी 21 अप्रैल को शांभवी इस्पात की जनसुनवाई होनी है। ऐसे में अपने इलाके को औद्योगिक प्रदूषण की असहनीय मार से बचाने की मंशा रखने वाले जागरूक लोगों की टीम बकायदा महिला समूह को साथ लेकर बैठकें करते हुए शांभवी इस्पात के विरोध में लामबंद भी हो रहे हैं ताकि जनसुनवाई में जबर्दस्त मुखालफत की जा सके।

जिले में स्थापित उद्योगों से उत्पन्न जहरीला और खतरनाक प्रदूषण ने जिस तरह से हाहाकार मचा रखा है, वहीं औद्योगिक विस्तार सुरसा के मुख की तरह लगातर बढ़ता ही जा रहा है। इसी क्रम में गेरवानी स्थित शांभवी इस्पात प्राइवेट लिमिटेड के क्षमता विस्तार के लिए आगामी 21 अप्रैल 2026 को लोक सुनवाई आयोजित की गयी है, जिसका जबरदस्त विरोध होने के आसार नजर आ रहे हैं। इस जनसुनवाई को लेकर प्रदूषण की मार झेल रहे स्थानीय ग्रामीणों में गुस्से का ज्वालामुखी धधकने लगा है। क्षेत्र के आसपास के प्रभावित होने वाले गांवों जैसे लाखा, चिराईपानी, पाली, देलारी, सराईपाली, जीवरी, गेरवानी, शिवपुरी, भेलवाटिकरा, बरलिया, छिरभौना, बरपाली, तराईमाल आदि तमाम गांवों के गली-मोहल्लों में शांभवी इस्पात के जनसुनवाई के खिलाफत गरमा गरम बहस की सुगबुगाहट देखने को मिल रही है। इलाके में स्थापित अन्य उद्योगों द्वारा प्रदूषण नियंत्रण में मनमाने ढंग से जानबूझकर की जा रही लापरवाही से त्रस्त लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। यही वजह है कि यहाँ की जनता इस जनसुनवाई का जमकर विरोध करने की तैयारी में है। गांवों में ग्रामीणों के बैठकों का दौर जारी है। यही नहीं, महिला समूहों में भी शांभवी इस्पात के विस्तार को लेकर चर्चाएं हो रही हैं जिसमें विरोध के सुर सुनाई दे रहे हैं।

विदित हो कि गेरवानी-सराईपाली क्षेत्र प्रदूषण के मामले में पूरे जिले में अव्वल नम्बर पर है। उद्योगों द्वारा फैलाये जा रहे ध्वनि प्रदूषण, जल प्रदूषण और वायु प्रदूषण ने यहाँ के वातावरण को बुरी तरह से अपने आगोश में ले रखा है। यहाँ का जन-जीवन अपने मौलिक अधिकारों से दूर जानवरों की तरह गुलामी की जंजीरों में जकड़ा बेबसी के आँसू बहाता नजर आता है। क्षेत्र के विकास जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पाने के लालच में यहाँ के लोगों ने उद्योगपतियों को औने-पौने दामों में अपनी पुरखों की कीमती जमीनें दे दीं, ताकि उनका और उनके बच्चों का भविष्य संवर सके, लेकिन विकास तो दूर जीवन जीना ही मुश्किल हो गया है। चौबीसों घंटे फ्लाई ऐश, सड़कों से उड़ते धूल, मशीनों और वाहनों की कर्कश आवाजों के बीच जीवन गुजर-बसर करना स्थानीय लोगों के लिए अंग्रेजों के जमाने के काले पानी की सजा से कम नहीं है। स्थानीय जनता विकास का झुनझुना बजाते-बजाते अब पूरी तरह से समझ चुकी है कि शासन और उद्योग जगत के खोखले दावे सिवाय मृग-मरिचिका के कुछ भी नहीं है। यही कारण है कि क्षेत्रीय ग्रामीण अब किसी भी कंपनी को स्थापना या विस्तार का मौका नहीं देना चाहते।

फिलहाल, शांभवी इस्पात प्राइवेट लिमिटेड के विस्तार की होने वाली जनसुनवाई से स्थानीय ग्रामीणों के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ने लगी हैं और कंपनी के कई गुना विस्तार से बढ़ने वाले प्रदूषण व भयानक परिणामों की कल्पना मात्र से लोग दहशत में हैं। उन्हें भय है कि वर्तमान समय में प्रदूषण की जो स्थिति है उसमें तो जीना मुश्किल हो रहा है, अगर विस्तार हो गया तो न जाने कितना दिन जिंदा रह पाएंगे? बात तहतक की करें तो इस कथित लोकतंत्र में जनता का नहीं पूँजीपतियों का राज है, जहाँ सीधे-सादे स्थानीय ग्रामीणों को साम, दाम, दण्ड और भेद की नीति से वश में करने की भरपूर कोशिश होगी। लक्ष्मी के खजाने के सिक्कों की मधुर खनक के आगे सरस्वती के वीणा के स्वर शायद ही सुनाई दे पाएंगे। जनता की उम्मीद कहलाने वाले जन प्रतिनिधि, नेता, मंत्री, विधायक जहाँ नतमस्तक होंगे, वहीं जनता के समक्ष गुड़ में चिपके मक्खी की तरह केवल हाथ मलने और सिर धुनने के सिवा और कोई रास्ता नहीं रह जाता। इसलिए ग्रामीण अब किसी भी बहकावे में न आकर एक जूट होकर पूर्ण विरोध करने की मंशा बना लिए हैं। अब देखना महत्वपूर्ण होगा कि 21 अप्रैल को होने वाले जनसुनवाई में आखिर जीत किसकी होती है? पर्यावरण की या प्रदूषण की?

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments

error: Content is protected !!