जिले में जहरीला और खतरनाक प्रदूषण ने जिस तरह से हाहाकार मचा रखा है, वहीं औद्योगिक
जानबूझकर की जा रही लापरवाही से त्रस्त लोगों का गुस्सा अब सातवें आसमान पर है। यही वजह है कि यहाँ की जनता इस जनसुनवाई का जमकर विरोध करने की तैयारी में है। गांवों में ग्रामीणों के बैठकों का दौर जारी है।
जानकारी के मुताबिक गेरवानी-सराईपाली क्षेत्र प्रदूषण के मामले में पूरे जिले में नम्बर एक पर है। उद्योगों द्वारा फैलाये जा रहे ध्वनि प्रदूषण, जल प्रदूषण और वायु प्रदूषण ने यहाँ के वातावरण को बुरी तरह से अपने चपेट में ले लिया है। यहाँ का जन-जीवन अपने मौलिक अधिकारों से दूर जानवरों की तरह गुलामी की जंजीरों में जकड़ा बेबसी के आँसू बहाता नजर आता
है। क्षेत्र के विकास जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पाने के लालच में यहाँ के लोगों ने उद्योगपतियों को औने-पौने दामों में अपनी पुरखों की कीमती जमीनें दे दीं, ताकि उनका और उनके बच्चों का भविष्य संवर सके, लेकिन विकास तो दूर मानव को जीना ही दुर्भर हो गया है। 24 घंटे फ्लाई ऐश, सड़कों से उड़ते धूल, मशीनों और वाहनों की कर्कश शोर शराबा के बीच गुजर-बसर करना स्थानीय लोगों के लिए अंग्रेजों के जमाने के काले पानी की सजा से कम नहीं है। स्थानीय जनता विकास का झुनझुना बजाते-बजाते अब पूरी तरह से समझ चुकी है कि शासन और उद्योग जगत के खोखले दावे सिवाय मृग-मरिचिका के कुछ भी नहीं है। यही कारण है कि क्षेत्रीय ग्रामीण अब किसी भी कंपनी को स्थापना या विस्तार का मौका नहीं देना चाहते।
फिलहाल, शांभवी इस्पात प्राइवेट लिमिटेड
के विस्तार की होने वाली जनसुनवाई से स्थानीय ग्रामीणों के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ने लगी हैं और कंपनी के कई गुना विस्तार से बढ़ने वाले प्रदूषण व खतरनाक परिणामों की कल्पना मात्र से लोग दहशत के साए में हैं। उन्हें भय है कि वर्तमान समय में प्रदूषण की जो स्थिति है उसमें तो जीना मुश्किल हो रहा है, अगर विस्तार हो गया तो न जाने कितना दिन जिंदा रह पाएंगे? बात तहतक की करें तो इस कथित लोकतंत्र में जनता का नहीं पूँजीपतियों का राज है, जहाँ सीधे-सादे स्थानीय ग्रामीणों को साम, दाम, दण्ड और भेद की नीति से वश में करने की भरपूर कोशिश होगी। लक्ष्मी के खजाने के सिक्कों की मधुर खनक के आगे सरस्वती के वीणा के स्वर शायद ही सुनाई दे पाएंगे। जनता की उम्मीद कहलाने वाले जन
इलाके में स्थापित अन्य उद्योगों द्वारा प्रदूषण नियंत्रण में मनमाने ढंग से
नतमस्तक होंगे, वहीं जनता के समक्ष गुड़ में चिपके मक्खी की तरह केवल हाथ मलने और सिर धुनने के सिवा और कोई रास्ता नहीं रह जाता। इसलिए ग्रामीण अब किसी भी बहकावे में न आकर एक जूट होकर पूर्ण विरोध करने की मंशा बना लिए हैं।
अब देखना महत्वपूर्ण होगा कि 21 अप्रैल को होने वाले जनसुनवाई में आखिर जीत किसकी होती है? पर्यावरण की या प्रदूषण की?


