Saturday, July 4, 2026
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डीआईजी प्रणाली भारी पड़ी आईपीएस पर, जंबो लिस्ट की हवा निकलीपुलिस विभाग में एसपी स्तर पर लंबे समय से जिस जंबो तबादला सूची की चर्चा थी, अब उसकी हवा निकलती दिखाई दे रही है। जो संकेत सामने आ रहे हैं, उनसे साफ है कि व्यापक फेरबदल की बजाय केवल औपचारिक “माइनर सर्जरी” होगी।

बस्तर संभाग में सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा और जगदलपुर जैसे गिने-चुने जिलों में बदलाव की संभावना है। बाकी जिलों में हालिया पदस्थापनाओं के कारण स्थिति यथावत रहने के आसार हैं।

असल सवाल मैदानी जिलों का है। जहां भाजपा शासन की नई योजना अनुरूप राज्य पुलिस सेवा से पदोन्नत डीआईजी स्तर के अधिकारी एसपी की कुर्सियों पर जमे हुए हैं। ऐसा लगता है कि यहां तबादला नीति नहीं, बल्कि “कुर्सी बचाओ नीति” लागू है। नतीजा यह है कि आईपीएस अधिकारियों के हिस्से चुनौतीपूर्ण जिले आते हैं, जबकि सामान्य जिलों की कमान उन्हीं चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती रहती है।
अजीब विडंबना है— नक्सलियों से लड़ना हो तो आईपीएस आगे, लेकिन सामान्य जिले की कमान संभालनी हो तो कुर्सियां पहले से आरक्षित दिखती हैं। जोखिम आईपीएस उठाएं और आरामदायक पदों का लाभ कोई और ले जाए—क्या यही नई प्रशासनिक व्यवस्था है?
सिंघम, दबंग और सूर्यवंशी सब बेअसर, सिस्टम एक पावरफुल अफसर के इर्द-गिर्द
जनमानस में इन दिनों एक ही चर्चा है—पूरा सिस्टम एक प्रभावशाली अधिकारी के इर्द-गिर्द सिमट गया है। पोस्टिंग से लेकर फैसलों तक, हर जगह उसी की चलती बताई जाती है। हालत यह है कि बड़े-बड़े अधिकारी भी उसके सामने असहज नजर आते हैं और उसके इर्द-गिर्द प्रमोटी प्रशंसकों का ऐसा घेरा बन चुका है, जहां विरोध की आवाज सुनाई ही नहीं देती। उनकी शह पर जिलों के अधिकारी आजकल पूरे फिल्मी रोल में है प्रेस कॉन्फ्रेंस एवं मीटिंग में विभिन्न आयोजनों में सिविल ड्रेस में हीरो बने घूमते नजर आते रहते हैं भाजपा शासन के आते ही हाशिए में पड़े अधिकारियों को अपना पावर दिखाने का पूरा अवसर मिला और वह पूरा पावर दिखाने में व्यस्त है खुद को साबित करने में लगे हैं कि सिंघम,दबंग,सूर्यवंशी,रावडी राठौर जैसे शानदार फिल्मी कैरेक्टर भी उनके सामने फेल है उनका कानून व्यवस्था आम जनता की सुविधाओं से कोई वास्ता नहीं

लेकिन सवाल यह है कि यदि व्यवस्था इतनी मजबूत है, तो अपराधी इतने मजबूत क्यों हैं?
यदि पूरी ताकत सिर्फ अपने स्टाफ पर सख्ती दिखाने में खर्च हो जाए और अपराधी खुलेआम कानून को चुनौती देते रहें, तो ऐसी सख्ती का लाभ किसे मिल रहा है? मातहत दबाव में हैं, जनता भय में है और अपराधी बेखौफ—फिर इस पूरी व्यवस्था की सफलता का पैमाना क्या है?

यही कारण है कि न जनता संतुष्ट दिख रही है, न जनप्रतिनिधि और न ही पुलिस का बड़ा वर्ग। कानून-व्यवस्था पर सवाल लगातार उठ रहे हैं, लेकिन व्यवस्था बदलने की बजाय व्यवस्था बचाने की कवायद ज्यादा दिखाई दे रही है।

योग्य मुख्यमंत्री और गृह मंत्री से पुलिस प्रशासन में संतुलित सुधार की अपेक्षा थी। लेकिन यदि भाजपा की इस नवीन संरचना को छूने का साहस भी न हो, तो यह संदेश जाता है कि कुछ कुर्सियां अब प्रशासनिक नहीं, बल्कि “अस्पृश्य” हो चुकी हैं।

कहावत है—”दूध देने वाली गाय की लात भी सहनी पड़ती है।” लगता है पुलिस विभाग में भी यही सिद्धांत लागू हो गया है। कुछ प्रभावशाली चेहरों की पकड़ इतनी मजबूत है कि तबादला नीति भी उनके सामने बौनी नजर आने लगी है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या पुलिस विभाग योग्यता और निष्पक्षता से चलेगा, या फिर प्रभाव, पकड़ और पैरवी ही पदस्थापना का सबसे बड़ा मापदंड बनी रहेगी?
और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—
क्या सरकार पुलिस व्यवस्था में वास्तविक सुधार चाहती है, या फिर सब कुछ “जैसे चल रहा है, वैसे ही चलता रहे” की नीति पर छोड़ दिया जाएगा?

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